उद्गम
भारत सरकार में विभागीय प्रणाली अपनाए जाने से पूर्व, सारा सरकारी कार्य गवर्नर-जनरल-इन काउन्सिल द्वारा निपटाया जाता था । यह काउन्सिल एक संयुक्त परामर्शदात्री बोर्ड के रूप में कार्य करती थी। सरकार के कार्य में जैसे-जैसे वृद्धि हुई और उसमें जटिलता आने लगी, विभिन्न विभागों के काम को काउन्सिल के सदस्यों में बांट दिया गया । केवल अधिक महत्वपूर्ण मामलों को गवर्नर-जनरल अथवा काउन्सिल द्वारा संयुक्त रूप से निपटाया जाता था ।
इस प्रक्रिया को लार्ड केनिन के कार्यकाल के दौरान काउन्सिल अधिनियम, 1861 द्वारा वैध बनाया गया जिससे विभागीय प्रणाली की शुरूआत और गवर्नर-जनरल की कार्यकारिणी परिषद की स्थापना हुई । वाइसराय का निजी सचिव इस कार्यकारिणी परिषद के सचिवालय का प्रमुख होता था, पर वह परिषद की बैठकों में सम्मिलित नहीं होता था । लार्ड विलिंग्डन ने इन बैठकों में अपने निजी सचिव को अपने साथ बैठाने की प्रथा आरंभ की । बाद में यह प्रथा जारी रही और नवम्बर, 1935 में वाइसराय के निजी सचिव को कार्यकारिणी परिषद के सचिव का अतिरिक्त पदनाम दिया गया ।
सितम्बर, 1946 में, अंतरिम सरकार का गठन होने पर इस कार्यालय के नाम में परिवर्तन किया गया, हालांकि इसके कृत्यों में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ । उस समय इस कार्यकारिणी परिषद के सचिवालय का नाम मंत्रिमंडल सचिवालय रखा गया । तथापि, ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतंत्रता के बाद पहले की अपेक्षा मंत्रिमंडल सचिवालय के कार्यों में एक तरह से परिवर्तन हुआ है । अब इसका कार्य मंत्रियों और मंत्रालयों को कागजात परिचालित करने के सामान्य कार्य तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह मंत्रालयों के बीच प्रभावी समन्वय के लिए एक संगठन के रूप में विकसित हुआ है ।


